निम्नलिखित अपठित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के सवार्थिक उत्तर लिखिए:
आदमी हो, स्नेह-बाती बन नया दीपक जलाना।
दर्द की परछाइयों के दानवी बंधन हटाना।
छटपटाती जिंदगी को चेतना संगीत देना।
विश्व को नवपंथ देना; हारते को जीत देना।
आदमी हो, बुझ रहे ईमान को विश्वास देना।
मुस्कुराकर वातिका में मधुभरा मधुमास देना।
शूल के बदले जगत को फूल की सौगात देना।
जो पिछड़ता हो उसे नवशक्ति देना, साथ देना।
आदमी हो, डूबते मँझधार में पतवार देना।
थक चला विश्वास साथी, आशा आधार देना।
क्रांति का संदेश देकर राह युग की मोड़ देना।
फिर नया मानव बनाना, रूढ़ियों को तोड़ देना।
आदमी हो, द्वेष के तूफ़ान को हँसकर मिटाना।
कंठ-भर विषपान करना, किंतु सबको प्यार देना।
मेटना मजबूरियों को; दीन को आधार देना।
खाइयों को पाटना; बिछड़े दिलों को जोड़ देना।
काव्यांश में 'आदमी हो' की पुनरावृत्ति क्यों की गई है? इस प्रश्न के लिए उचित विकल्प का चयन कीजिए:
काव्यांश में 'आदमी हो' की पुनरावृत्ति क्यों की गई है? इस प्रश्न के लिए उचित विकल्प का चयन कीजिए:
चरण 1: काव्यांश का अवलोकन करना।
काव्यांश में यह सवाल पूछा गया है कि मानव रूढ़ियों और क्रांति के बीच क्या परिवर्तन ला सकता है। काव्यांश के माध्यम से लेखक यह बताने की कोशिश करते हैं कि मानव की सोच और कार्यशक्ति में अपार शक्ति है, जो सामाजिक बदलावों और मानवाधिकारों की दिशा में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।
चरण 2: रूढ़ियों के बारे में समझना।
रूढ़ियाँ समाज में स्थापित परंपराएं या मान्यताएँ होती हैं, जो समय के साथ बदलने की बजाय जड़ हो जाती हैं और समाज के विकास को रोकती हैं। ये अक्सर अविवेकपूर्ण होती हैं और व्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता में बाधक बनती हैं। उदाहरण स्वरूप, जातिवाद, लिंग भेदभाव और सामंतवादी सोच जैसी अवधारणाएँ समाज को पीछे खींचती हैं।
चरण 3: क्रांति के बारे में समझना।
क्रांति का अर्थ है परिवर्तन या बदलाव, जो समाज में एक नई दिशा लाने के लिए किया जाता है। जब किसी समाज में रूढ़िवादी विचारधारा और परंपराएँ अत्यधिक हानिकारक हो जाती हैं, तो क्रांति की आवश्यकता होती है। यह न केवल विचारों में परिवर्तन लाती है, बल्कि समाज के ढाँचे, नियमों और अधिकारों में भी बदलाव करती है।
चरण 4: मानव द्वारा परिवर्तन लाने की क्षमता।
मानव के पास सोचने, समझने और समाज में परिवर्तन लाने की अद्वितीय शक्ति है। काव्यांश के अनुसार, मानव अपनी शक्ति और प्रयासों के द्वारा रूढ़ियों को चुनौती दे सकता है और क्रांति ला सकता है। वह समाज के पिछड़ेपन को दूर करने, समानता और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित हो सकता है। जब लोग एकजुट होते हैं और अपने अधिकारों के लिए खड़े होते हैं, तो वे समाज में एक क्रांति उत्पन्न कर सकते हैं, जो रूढ़ियों को तोड़ने और प्रगति की दिशा में एक नया कदम बढ़ाने में मदद करती है।
अंतिम उत्तर: काव्यांश के अनुसार, मानव रूढ़ियों को चुनौती देकर और एकजुट होकर क्रांति ला सकता है। वह अपनी सोच में बदलाव कर समाज में परिवर्तन कर सकता है, जो उसे अधिक स्वतंत्र, समान और प्रगतिशील बनाता है। इस तरह, मानव परिवर्तन की शक्ति से रूढ़ियों को तोड़कर समाज में नई सोच और दिशा उत्पन्न कर सकता है।
चरण 1: द्वेष और प्रेम का अर्थ समझना।
'द्वेष' का अर्थ है किसी के प्रति नफरत या घृणा, जबकि 'प्रेम' का अर्थ है किसी के प्रति स्नेह और सकारात्मक भावना। मनुष्य के जीवन में द्वेष और प्रेम दोनों भावनाएँ पाई जाती हैं, लेकिन ये दोनों एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत होते हैं। जब कोई व्यक्ति द्वेष करता है, तो वह दूसरे को हानि पहुँचाने की भावना से प्रेरित होता है, जबकि प्रेम से प्रेरित व्यक्ति दूसरे की भलाई और सुख की कामना करता है।
चरण 2: द्वेष करने वालों के प्रति कर्तव्य।
आदमी का कर्तव्य है कि वह द्वेष करने वालों के प्रति अपने मन में घृणा या नफरत न रखें, बल्कि उनका सामना प्रेम और समझ से करें। प्रेम के द्वारा हम न केवल द्वेष करने वाले व्यक्ति को सकारात्मक रूप में प्रभावित कर सकते हैं, बल्कि खुद भी मानसिक शांति और संतुलन पा सकते हैं। जब हम किसी से द्वेष करने के बजाय प्रेम से मिलते हैं, तो यह स्थिति में बदलाव ला सकता है और द्वेष को कम कर सकता है।
चरण 3: कष्ट सहन करना।
कभी-कभी द्वेष करने वाले लोग हमें कष्ट या अपमान पहुँचाते हैं। ऐसे में मनुष्य का कर्तव्य है कि वह इस कष्ट को सहकर भी प्रेम का संदेश फैलाए। यह न केवल हमारी मानसिक और भावनात्मक मजबूती को दर्शाता है, बल्कि यह समाज में एक सकारात्मक और समरसता का वातावरण भी उत्पन्न करता है। कष्ट सहना और फिर भी प्रेम बनाए रखना एक उच्च मानवीय गुण है, जो हमें दूसरों के प्रति दया और करुणा की भावना से प्रेरित करता है।
अंतिम उत्तर: आदमी होने के नाते, मनुष्य का कर्तव्य है कि वह द्वेष का सामना प्रेम से करे और कष्ट सहकर भी प्रेम का ही संदेश दे। इस तरह, वह द्वेष के मुकाबले प्रेम को चुनकर समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकता है और स्वयं को मानसिक शांति और संतुष्टि प्रदान कर सकता है।