श्लोक :
विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्।।
सन्दर्भ :
यह श्लोक नीति-साहित्य से लिया गया है। इसमें विद्या के महत्व तथा उसके क्रमिक फल का वर्णन किया गया है। यह श्लोक विद्यार्थियों को शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य का बोध कराता है।
प्रसंग :
इस श्लोक में बताया गया है कि विद्या केवल ज्ञान प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करती है। विद्या से विनम्रता आती है और वही आगे चलकर जीवन में सफलता और सुख का कारण बनती है।
हिन्दी भावार्थ :
विद्या मनुष्य को विनम्र बनाती है। विनम्रता से मनुष्य योग्य बनता है। योग्यता से उसे धन की प्राप्ति होती है। धन से वह धर्म का पालन करता है और धर्म से अंततः सुख प्राप्त होता है।
व्याख्या :
इस श्लोक में जीवन की उन्नति का एक क्रम बताया गया है। सबसे पहले विद्या आवश्यक है, क्योंकि बिना विद्या के मनुष्य अज्ञान में रहता है। जब वह विद्या प्राप्त करता है तो उसके अंदर अहंकार नहीं, बल्कि विनम्रता उत्पन्न होती है। विनम्र व्यक्ति समाज में सम्मान प्राप्त करता है और योग्य माना जाता है। योग्यता के कारण उसे उचित अवसर और धन प्राप्त होता है। धन का सदुपयोग धर्म कार्यों में किया जाता है। जब मनुष्य धर्म का पालन करता है, तो उसके जीवन में वास्तविक सुख और शांति आती है।
उपसंहार :
अतः यह श्लोक हमें सिखाता है कि विद्या का उद्देश्य केवल धनार्जन नहीं, बल्कि विनम्रता, धर्म और सुख की प्राप्ति है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को सच्ची विद्या ग्रहण कर अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।